काश ठहर सकता ......

 कुछ बेपरवाह और बेहद बेफिक्री सा गुजरा था । पलट कर देखा तो पता लगा वो मेरे जीवन का सबसे मासूम टुकड़ा था । 

अरे अब जहन में आया वो तो धुल में लिपटा हुआ मेरा सुनहरा बचपन था । 

मेरा चिल्लरो से भरा खन खन करता वो गुल्लक,
वो छुपम छपाई कड़ी दुपहरी में भी देती थी ठंडक ।

वो बारिश के पानी में कागज की ढेरो नाव चलाना ,
वो मीठी गोलिया भी लगती थी खुशियों का खजाना । 
छुट्टी के दिन सारा मोहल्ला नाप लेते थे ,
उन झूठ-मूठ के खेलो को भी बड़ी सच्चाई से खेलते थे। 

वो स्कूल के बस्तों को हर रोज सजाना ,
वो स्कूल में ही कभी पेन्सिल कभी रबड़ का खो जाना । 

वो छुट्टी की घंटी बजते ही यूँ दौड़ लगाना, न जाने कहा खो गया वो मनमौजी जमाना । 

उन गर्मी की छुट्टियों में हुल्लड़ मचाना , शाम को माँ की डांट सुनकर ही घर वापस जाना । 

उन रेत के ढेरों से सुन्दर आशियाँ बनाना , कितनी आसान लगती थी ये जिंदगी । 
बड़ा ही नासमझ था वो गुजरा हुआ बचपन का जमाना । 

वो दोस्तों से झगड़ना वो रूठना मनाना , वो परीक्षा की घड़िया ,वो किताबों का जमाना । 

बचपन में होती थी त्योहारों की असली ख़ुशी ,
अब तो हर त्यौहार लगता है एक आम सा दिन । 

न जाने कहा खो गये  वो  सब नादान असली चेहरे ,
बड़े होकर लगा लिए सबने चेहरे पे न जाने कितने चेहरे । 

काश वो बेफिक्री के दिन मै फिर से जी सकता ,
काश उन  दिनों में वापस जा के कुछ देर ठहर सकता!!


R. P. SINGH

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