"चेहरे पर ओज"

चेहरे पर ओज रहता है

सुबह शाम रोज रहता है

मनमौजी हूँ, पर बेपरवाह नहीं,
प्रचुर उमंगों का जीवन जीता हूँ
मालूम है मिआद इस मशीन की
तो वजूद के गिलाफ रोज सीता हूँ

गिड़गिड़ाना मुझ को मंजूर नहीं
मैं छाती ठोंककर आगे बढ़ता हूँ
दुराधर्ष निराशा भी हाथ लगती है
पर दोष सारे अपने पर मढ़ता हूँ

मुझे मंजिल दूर से नज़र आती है
उन्माद में नहीं, होश में रहता हूँ
बेरंग जिन्दगी में लोग टूट जाते हैं
मैं उस वक्त भी, जोश में रहता हूँ

मुझे परखना है तो आना जरूर
मैं तुम्हें मैदान में मिल जाऊंगा
सुतीक्ष्ण काँटे बन डराते रहो मुझे
मैं गुलाब बन खिल जाऊंगा

चेहरे पर ओज रहता है
सुबह शाम रोज रहता है

R. P. Singh

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